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प्रदर्शन के नियम अब सुप्रीम कोर्ट तय करेगा: ‘आंदोलन लाठीचार्ज का बहाना नहीं’

July 28, 2026 1 min read
प्रदर्शन के नियम अब सुप्रीम कोर्ट तय करेगा: ‘आंदोलन लाठीचार्ज का बहाना नहीं’

जंतर-मंतर और बिहार में पुलिस कार्रवाई के आरोपों के बाद अदालत ने कहा — पूरे देश के लिए एक समान प्रोटोकॉल चाहिए। सभी याचिकाएँ मंगलवार को एक साथ सुनी जाएँगी।

NEET पेपर लीक को लेकर 36 दिन चला आंदोलन भले वापस ले लिया गया हो, लेकिन उसका सबसे टिकाऊ असर अब सामने आ रहा है — और वह संसद में नहीं, सुप्रीम कोर्ट में दिख रहा है।

सोमवार को शीर्ष अदालत ने कहा कि शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार संविधान से पूरी तरह संरक्षित है और सिर्फ़ आंदोलन होने भर से पुलिस की ज़्यादती को जायज़ नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि वह पूरे देश के लिए प्रदर्शनों को लेकर एक समान दिशानिर्देश तय करने पर विचार कर रही है।

अदालत ने क्या कहा

मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत तथा न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार पूरी तरह गारंटीशुदा है। इसे नकारा नहीं जा सकता। सिर्फ़ इसलिए कि आंदोलन हो रहा है, पुलिस की ज़्यादती को जायज़ नहीं ठहराया जा सकता।”

पीठ ने साथ ही यह भी जोड़ा कि लोकतंत्र में प्रदर्शन के दौरान अनुशासन उतना ही ज़रूरी है। मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी थी कि आंदोलन होने का मतलब यह नहीं कि लाठीचार्ज हो, और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए स्वयं-विकसित अनुशासन आवश्यक है।

सुनवाई के दौरान एक वकील ने प्रदर्शनों में घायल हुए पुलिसकर्मियों का मुद्दा भी उठाया। इस पर न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि हर व्यक्ति का जीवन महत्वपूर्ण है, चाहे वह कोई भी हो।

सिर्फ़ दिल्ली का मामला नहीं

यह टिप्पणियाँ उन याचिकाओं के समूह पर सुनवाई के दौरान आईं जिनमें माँग की गई है कि पूरे देश में शांतिपूर्ण प्रदर्शन बिना अनावश्यक पाबंदियों के हो सकें, इसके लिए दिशानिर्देश बनाए जाएँ।

ये याचिकाएँ दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुई कार्रवाई के अलावा बिहार में हुए प्रदर्शनों के बाद दायर हुईं। एक याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता फ़ौज़िया शकील ने आरोप लगाया कि सीवान में बिहार बंद के दौरान सुरक्षा बलों ने एके-47 राइफ़लों का इस्तेमाल किया। वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने भी बिहार में पुलिस कार्रवाई पर चिंता जताते हुए कहा कि अखिल भारतीय आदेश की ज़रूरत है।

पीठ इस तर्क से सहमत दिखी। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि एक प्रोटोकॉल होना चाहिए, प्रदर्शन के लिए उचित जगह होनी चाहिए और अनावश्यक पाबंदी नहीं होनी चाहिए — असामाजिक तत्वों से अलग से निपटा जा सकता है। उन्होंने साफ़ कहा कि यह सिर्फ़ दिल्ली का सवाल नहीं है और प्रोटोकॉल में एकरूपता ज़रूरी है।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को भरोसा दिलाया कि सरकार निष्पक्ष रूप से सहयोग करेगी।

मामला यहाँ तक कैसे पहुँचा

जंतर-मंतर पर धरना जून में शुरू हुआ था, जब ऑनलाइन समूह ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) ने बार-बार होने वाले प्रश्नपत्र लीक के ख़िलाफ़ प्रदर्शन का आह्वान किया। आंदोलन को व्यापक ध्यान तब मिला जब जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक इसमें शामिल हुए और अनशन शुरू किया — जिसे उन्होंने 23 जुलाई को मेदांता अस्पताल में 26 दिन बाद समाप्त किया।

20 जुलाई को मानसून सत्र के पहले दिन निकाले गए ‘संसद चलो’ मार्च के दौरान झड़प हुई। पुलिस का कहना था कि मार्च की अनुमति नहीं दी गई थी, जबकि प्रदर्शनकारियों ने छात्रों पर लाठीचार्ज, आँसू गैस और बल प्रयोग का आरोप लगाया। 25 जुलाई को धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े के बाद धरना वापस ले लिया गया।

अब आगे क्या

पीठ ने निर्देश दिया है कि इस विषय से जुड़ी सभी याचिकाएँ मंगलवार को एक साथ सुनी जाएँ। यानी अदालत मामले को टुकड़ों में नहीं, एक साथ देखना चाहती है — जो आमतौर पर व्यापक दिशानिर्देश तय करने की दिशा में उठाया जाने वाला क़दम होता है।

क्यों मायने रखता है

भारत में प्रदर्शन की अनुमति, जगह और पुलिस बल के इस्तेमाल को लेकर अब तक कोई एक राष्ट्रीय ढाँचा नहीं है। यह ज़िम्मेदारी राज्य पुलिस और स्थानीय प्रशासन के विवेक पर छोड़ी गई है, जिसके नतीजे राज्य-दर-राज्य अलग-अलग रहे हैं।

अगर सुप्रीम कोर्ट समान प्रोटोकॉल तय करता है, तो उसका असर इस एक आंदोलन से कहीं आगे जाएगा — किसान आंदोलन हों, भर्ती परीक्षाओं से जुड़े प्रदर्शन हों या स्थानीय धरने, हर मामले में यही ढाँचा लागू होगा। यही वजह है कि मंगलवार की सुनवाई पर नज़र रहेगी।

स्रोत: बिज़नेस स्टैंडर्ड, बार एंड बेंच, लाइव लॉ, बिज़नेस स्टैंडर्ड (मानसून सत्र)

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