खैबर पख्तूनख्वा के कबल थाने के बाहर हुआ विस्फोट उस घाटी को फिर दहला गया, जो कभी पाकिस्तानी तालिबान के कब्ज़े में थी — और जहाँ लोग अब सड़कों पर उतरकर अमन माँग रहे थे।
कबल में हुआ क्या
पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिमी स्वात ज़िले में रविवार, 2 अगस्त को एक संदिग्ध आत्मघाती हमलावर ने कम से कम 14 लोगों की जान ले ली। मरने वालों में पुलिसकर्मी और आम नागरिक दोनों शामिल हैं। खैबर पख्तूनख्वा के बचाव संगठन रेस्क्यू 1122 के प्रवक्ता बिलाल अहमद फ़ैज़ी ने अरब न्यूज़ को बताया कि 14 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है और 15 घायलों का इलाज चल रहा है। घायलों को सैदू शरीफ़ और मिंगोरा के अस्पतालों में भर्ती कराया गया।
धमाका कबल थाने के बाहर उस वक़्त हुआ, जब “स्वात पीपल्स पीस अपराइज़िंग” नाम की रैली ख़त्म होने के बाद लोग वहाँ से निकल रहे थे। यह रैली स्थानीय निवासियों और नागरिक समाज संगठनों ने इलाक़े में दोबारा बढ़ रही चरमपंथी हिंसा के विरोध में आयोजित की थी। यानी निशाने पर वही भीड़ थी जो हिंसा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने जुटी थी।
निशाना रैली थी या पुलिस थाना?
कबल की असिस्टेंट कमिश्नर आयशा नासिर ने पुष्टि की कि विस्फोट थाने के बाहर उस समय हुआ जब लोग सभा से लौट रहे थे। उन्होंने कहा कि हालाँकि सभा स्थानीय लोगों ने शांति रैली के तौर पर आयोजित की थी, लेकिन हमले का स्पष्ट निशाना पुलिस जान पड़ती है, क्योंकि धमाका कबल थाने के गेट के ठीक बाहर हुआ।
स्वात के ज़िला पुलिस अधिकारी उमर गंडापुर ने स्थानीय मीडिया को बताया कि जाँचकर्ताओं को घटनास्थल से संदिग्ध आत्मघाती हमलावर का सिर बरामद हुआ है और जाँच जारी है। ख़बर लिखे जाने तक किसी संगठन ने हमले की ज़िम्मेदारी नहीं ली थी।
खैबर पख्तूनख्वा के मुख्यमंत्री मुहम्मद सोहेल अफ़रीदी ने धमाके की निंदा करते हुए विस्तृत रिपोर्ट माँगी है। उन्होंने प्रांतीय स्वास्थ्य विभाग को घायलों के बेहतरीन इलाज के निर्देश दिए और कहा कि इसमें किसी लापरवाही को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
स्वात: वह घाटी जो दो बार जल चुकी है
स्वात कोई साधारण ज़िला नहीं है। कभी “पाकिस्तान का स्विट्ज़रलैंड” कहलाने वाली यह घाटी 2007 से 2009 के बीच पाकिस्तानी तालिबान (टीटीपी) के व्यावहारिक नियंत्रण में चली गई थी। स्कूल बंद कराए गए, लड़कियों की पढ़ाई पर पाबंदी लगी और सार्वजनिक सज़ाओं का दौर चला। 2009 में पाकिस्तानी सेना के बड़े सैन्य अभियान के बाद इलाक़े पर दोबारा राज्य का नियंत्रण स्थापित हुआ और लाखों लोग विस्थापित होकर लौटे।
अरब न्यूज़ के मुताबिक़, हाल के वर्षों में ज़िले के कुछ हिस्सों में चरमपंथी हमलों की वापसी को लेकर जनता की चिंता लगातार बढ़ी है। यही चिंता उस “पीस अपराइज़िंग” की जड़ में थी जिसके ठीक बाद यह धमाका हुआ।
आम नागरिकों का आंदोलन क्यों अहम था
इस रैली की सबसे बड़ी ख़ासियत यह थी कि इसे किसी राजनीतिक दल ने नहीं, बल्कि स्थानीय निवासियों और नागरिक समाज ने खड़ा किया था। दक्षिण एशिया में सुरक्षा-केंद्रित बहसों में आम नागरिक अक्सर आँकड़ा बनकर रह जाते हैं। स्वात में लोगों का सड़क पर उतरना इस मायने में अलग था कि वहाँ हिंसा के ख़िलाफ़ माँग नीचे से उठ रही थी, ऊपर से थोपी नहीं गई थी।
यही वजह है कि ऐसे जमावड़े पर हमला सिर्फ़ जनहानि नहीं है — यह नागरिक आवाज़ को डराकर चुप कराने की कोशिश भी मानी जाती है। समाचार रिपोर्टों के अनुसार पाकिस्तान में इस साल जनवरी से अब तक हज़ारों चरमपंथी घटनाएँ दर्ज हो चुकी हैं, जिनमें सैनिक, पुलिसकर्मी और नागरिक — तीनों वर्ग मारे गए हैं।
भारत के लिए यह ख़बर क्यों मायने रखती है
खैबर पख्तूनख्वा में अस्थिरता का असर सीधे तौर पर पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान सीमा पर सुरक्षा समीकरणों पर पड़ता है, और इसका असर पूरे क्षेत्र की सुरक्षा पर पड़ता है। दूसरा, इससे यह भी पता चलता है कि पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा चुनौती अब सीमा-केंद्रित नहीं रह गई है — वह उसके अपने प्रांतीय प्रशासन और पुलिस ढाँचे को निशाना बना रही है।
तीसरा और शायद सबसे ज़रूरी पहलू यह है कि जब आम लोगों की शांति की माँग पर ही हमला होता है, तो हिंसा-विरोधी नागरिक आंदोलनों की जगह सिकुड़ती है। आने वाले दिनों में देखने वाली बात यह होगी कि क्या कोई संगठन ज़िम्मेदारी लेता है, जाँच किस दिशा में जाती है, और क्या स्वात के लोग दोबारा सड़क पर उतरने का साहस जुटा पाते हैं।
स्रोत: अरब न्यूज़, सीएनएन, द वॉशिंगटन पोस्ट



