AI डेटा सेंटरों की मेमोरी चिप की ज़बरदस्त मांग ने DRAM और NAND की क़ीमतें आसमान पर पहुंचा दी हैं — और इसकी सबसे बड़ी क़ीमत चुका रहा है सस्ते स्मार्टफोन ख़रीदने वाला भारतीय ग्राहक।

अगर आपको लग रहा है कि नया फोन पिछले साल के मुक़ाबले महंगा हो गया है या उतने ही दाम में कम रैम मिल रही है, तो यह सिर्फ़ आपका वहम नहीं है। भारत का स्मार्टफोन बाज़ार इस समय एक अनोखे संकट से गुज़र रहा है, जिसकी जड़ स्मार्टफोन इंडस्ट्री में नहीं, बल्कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दुनिया में है।
मेमोरी चिप का संकट क्या है?
दुनिया भर में AI डेटा सेंटरों की बाढ़ आई हुई है, और इन सबको चाहिए भारी मात्रा में मेमोरी चिप। नतीजा — स्मार्टफोन में लगने वाली DRAM (रैम) और NAND (स्टोरेज) चिप की सप्लाई टाइट हो गई है और क़ीमतें बेतहाशा बढ़ी हैं। रिपोर्टों के मुताबिक़ बीते कुछ महीनों में DRAM की क़ीमतें क़रीब 50% और NAND फ्लैश की क़ीमतें क़रीब 90% तक उछल चुकी हैं।
भारत पर असर सबसे तीखा क्यों?
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा स्मार्टफोन बाज़ार है, लेकिन यहां बाज़ार का बड़ा हिस्सा बजट और मिड-रेंज फोन का है — यानी वही सेगमेंट जहां मेमोरी की लागत कुल क़ीमत का सबसे बड़ा हिस्सा होती है। टेकक्रंच की रिपोर्ट के अनुसार काउंटरपॉइंट रिसर्च के आंकड़ों में अप्रैल-जून तिमाही में भारत की स्मार्टफोन शिपमेंट सालाना आधार पर 10% गिर गई।
बाज़ार के आंकड़े साफ़ तस्वीर दिखाते हैं: शुरुआती तिमाही में प्रीमियम सेगमेंट 25% बढ़ा, जबकि किफ़ायती (अफोर्डेबल) सेगमेंट में क़रीब 46% की भारी गिरावट आई। यानी महंगे फोन ख़रीदने वाले ग्राहक पर असर कम है, लेकिन 10-15 हज़ार रुपये का फोन ढूंढने वाला ग्राहक बाज़ार से बाहर होता जा रहा है।
आगे और बढ़ेंगे दाम?
रिसर्च फर्म CMR का अनुमान है कि मेमोरी की बढ़ती लागत के चलते 2026 में भारत की स्मार्टफोन शिपमेंट 10-12% तक घट सकती है। कंपनियां लागत घटाने के लिए कई रास्ते अपना रही हैं — कम वेरिएंट लॉन्च करना, उसी दाम पर कम रैम/स्टोरेज देना, या फिर दाम सीधे बढ़ा देना। जानकारों का मानना है कि सस्ते एंड्रॉयड फोन का दौर फ़िलहाल मुश्किल में है।
ग्राहक के लिए इसका मतलब क्या है?
अगर आप नज़दीकी भविष्य में फोन बदलने की सोच रहे हैं, तो मौजूदा स्टॉक पर चल रहे ऑफ़र आपके लिए बेहतर सौदा हो सकते हैं, क्योंकि नए लॉन्च होने वाले मॉडलों में बढ़ी हुई मेमोरी लागत की झलक दिखनी तय मानी जा रही है। साथ ही, फोन ख़रीदते समय रैम-स्टोरेज कॉन्फ़िगरेशन पर पहले से ज़्यादा ध्यान देना ज़रूरी हो गया है — क्योंकि अब वही असली क़ीमत तय कर रहा है।
यह संकट कब तक रहेगा, यह इस पर निर्भर करेगा कि मेमोरी निर्माता कितनी तेज़ी से क्षमता बढ़ाते हैं और AI डेटा सेंटरों की मांग कहां जाकर ठहरती है। फ़िलहाल इतना तय है — AI की यह दौड़ आम भारतीय ग्राहक की जेब से होकर गुज़र रही है।
स्रोत: टेकक्रंच, स्टोरीबोर्ड18, बीबॉम


