28 फरवरी से बंद पड़ी दुनिया की सबसे अहम तेल गली ने भारत की 140 में से 122 वस्तुओं के दाम बढ़ा दिए। आंकड़ों में समझिए — असर कहाँ सबसे ज़्यादा है, आपकी महंगाई दर पर कितना पड़ेगा, और सरकार की काट क्या है।
फरवरी के आखिरी दिन जो हुआ, उसका असर आज आपके गैस सिलेंडर, हवाई टिकट और खाने की थाली — तीनों तक पहुँच चुका है। 28 फरवरी 2026 को ईरान पर अमेरिका और इज़राइल के संयुक्त हवाई हमलों के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य बंद हो गया। यह वही रास्ता है जहाँ से संकट से पहले दुनिया का पाँचवाँ हिस्सा समुद्री कच्चा तेल और LNG गुज़रता था। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने इसे वैश्विक तेल बाज़ार के इतिहास की सबसे बड़ी आपूर्ति बाधा कहा है।
पाँच महीने बाद अब इस झटके का हिसाब लगाना मुमकिन है — और वह हिसाब उम्मीद से ज़्यादा पेचीदा है।
पहले पैमाना समझिए
होर्मुज से रोज़ाना 130 से ज़्यादा जहाज़ गुज़रते थे। बंदी के बाद यह संख्या 10 से भी नीचे आ गई। भारतीय कच्चे तेल की टोकरी का दाम फरवरी में 69 डॉलर प्रति बैरल था, मार्च में 126 डॉलर हो गया और एक वक्त 157 डॉलर तक पहुँचा। कतर ने रास लफ्फान सुविधा पर मिसाइल हमले के बाद LNG निर्यात पर फोर्स मेज्योर घोषित कर दिया। वैश्विक यूरिया कीमतें 50% चढ़ गईं।
भारत इस झटके के सामने दुनिया की सबसे ज़्यादा असुरक्षित बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में है। ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) की रिपोर्ट के मुताबिक:
- भारत अपने कच्चे तेल का 88% आयात करता है, जिसका लगभग आधा हिस्सा होर्मुज से आता था।
- घरेलू LPG का 60% से ज़्यादा आयातित है, और उस आयात का 90% इसी रास्ते से आता है।
- भारत के आधे से ज़्यादा LNG की आपूर्ति कतर और यूएई से इसी रास्ते होती है।
यानी झटका सिर्फ पेट्रोल पंप का नहीं, रसोई का भी है।
सबसे अहम आंकड़ा: 140 में से 122
ORF के जूनियर फेलो आर्य रॉय बर्धन ने मई 2026 में प्रकाशित एक विशेष रिपोर्ट में इस झटके को लियोन्टिफ इनपुट-आउटपुट मॉडल से मापा है। सरल भाषा में, यह मॉडल अर्थव्यवस्था को 140 उत्पादों के जाल की तरह देखता है, जहाँ हर उत्पाद दूसरे को कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल करता है — और फिर हिसाब लगाता है कि एक आयातित चीज़ महँगी होने पर वह महँगाई कितने चरणों में कहाँ-कहाँ फैलती है।
नतीजे ये रहे:
- 140 में से 122 उत्पादों के दाम 1% से ज़्यादा बढ़े — यानी अर्थव्यवस्था का 87% हिस्सा प्रभावित। 55 उत्पादों में यह बढ़ोतरी 5% से ऊपर गई।
- कुल असर का 71% हिस्सा अकेले कच्चे तेल से आया।
- उत्पादक कीमतों में औसत बढ़ोतरी 5.78% रही।
सबसे चौंकाने वाली कड़ी: तेल से थाली तक
रिपोर्ट की सबसे दिलचस्प खोज यह है कि सबसे बड़ा नुकसान सीधे नहीं, बल्कि परोक्ष रूप से हुआ।
खाद पर कच्चे तेल का सीधा असर सिर्फ 0.19% था। लेकिन जब उद्योगों के बीच की सारी कड़ियाँ जोड़ी गईं — तेल से पेट्रोलियम उत्पाद, फिर कार्बनिक रसायन, फिर खाद — तो खाद की कीमतों पर कुल असर 17.8% निकला। यानी 90 गुना से ज़्यादा का प्रवर्धन।
सेवा क्षेत्र में सबसे सीधा शिकार हवाई परिवहन रहा, जहाँ पेट्रोलियम उत्पाद कुल लागत का 42.7% हैं — नतीजा 23.7% की कीमत वृद्धि।
आपकी महंगाई दर पर कितना पड़ेगा
यहाँ रिपोर्ट दो अलग-अलग आंकड़े देती है, और यही फ़र्क समझना ज़रूरी है।
संरचनात्मक छत: अगर पूरी लागत उपभोक्ता तक पहुँच जाए, कोई सरकारी हस्तक्षेप न हो और कंपनियाँ मुनाफा न घटाएँ — तो CPI पर 4.48 प्रतिशत अंक का झटका। लेकिन यह पूर्वानुमान नहीं, ऊपरी सीमा है।
वास्तविक अनुमान: भारत में लागत का 35–50% हिस्सा ही 12–18 महीनों में उपभोक्ता तक पहुँचता है। इस आधार पर CPI बेसलाइन से 1.6–2.2 प्रतिशत अंक ऊपर जाएगी, और शीर्ष महँगाई दर 2026 में 5.0–5.6% रह सकती है — RBI के 4% लक्ष्य से ऊपर, लेकिन 2–6% के सहनशीलता दायरे के भीतर।
CPI के भीतर सबसे बड़ा योगदान परिवहन (23.5%) और खाद्य (28.2%) का है। खाद्य का हिस्सा इसलिए बड़ा है क्योंकि CPI टोकरी में उसका भार ही 36.75% है। आवास (12.4%) बिजली-गैस के रास्ते और कपड़े (9.4%) सिंथेटिक धागे की कड़ी से प्रभावित हुए।
तो अब तक महँगाई दिखी क्यों नहीं?
यह सबसे वाजिब सवाल है। मार्च 2026 की CPI 3.40% रही — फरवरी के 3.21% से बमुश्किल ऊपर, जबकि कच्चा तेल लगभग दोगुना हो चुका था। परिवहन महँगाई तो साल-दर-साल 0.00% रही।
इसकी वजह ORF रिपोर्ट साफ़ बताती है: उत्पाद शुल्क में कटौती और तेल विपणन कंपनियों द्वारा अपने मुनाफे में झटका सोख लेना। सरकार ने इसके अलावा प्राकृतिक गैस नियंत्रण आदेश के तहत राशनिंग लागू की, पेट्रो-रसायन उत्पादों पर सीमा शुल्क में छूट दी, और भारतीय ध्वजवाहक जहाज़ों की सुरक्षित आवाजाही के लिए ईरान से द्विपक्षीय बातचीत की।
लेकिन यह टलना है, टलाव नहीं। रिपोर्ट चेताती है कि अगर संघर्ष लंबा खिंचा और राजकोषीय गुंजाइश खत्म हुई, तो पास-थ्रू 75% या उससे ऊपर जा सकता है, जो CPI को 6% की ऊपरी सीमा के पार धकेल देगा और मौद्रिक नीति समिति को औपचारिक रूप से सरकार को जवाब देना पड़ेगा।
भारत की काट: तीन मोर्चे
पहला — स्रोत बदलना। द प्रिंट के मुताबिक जुलाई में भी रूसी कच्चा तेल भारत के कुल तेल आयात का लगभग 50% बना रहा। रिफाइनरियाँ वेनेजुएला, पश्चिमी अफ्रीका और लैटिन अमेरिका से भी खरीद रही हैं।
दूसरा — LPG का नया रास्ता। अटलांटिक काउंसिल के अनुसार भारत ने 2026 में अमेरिका से 22 लाख मीट्रिक टन LPG आयात का एक साल का करार किया है — भारतीय बाज़ार में अमेरिकी LPG का यह पहला संरचित अनुबंध है। यह अहम है क्योंकि कच्चे तेल के मुकाबले LPG और LNG में भारत की होर्मुज-निर्भरता कहीं ज़्यादा गहरी है।
तीसरा — घरेलू उत्पादन। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 84,084 करोड़ रुपये की समुद्र मंथन राष्ट्रीय अपतटीय अन्वेषण योजना को मंज़ूरी दी है, जो वित्त वर्ष 2030-31 तक चलेगी। इसमें भूकंपीय डेटा संग्रह और गहरे व अति-गहरे समुद्र में तेज़ रफ़्तार खोजी ड्रिलिंग शामिल है। सरकार को उम्मीद है कि इससे 60 करोड़ टन तेल-समतुल्य से ज़्यादा भंडार जुड़ेंगे।
असली सबक
ORF की रिपोर्ट का सबसे उपयोगी निष्कर्ष नीति के लिए है: चूँकि कुल असर का 71% अकेले कच्चे तेल से आता है, इसलिए प्रतिस्पर्धी कीमत पर वैकल्पिक कच्चा तेल सुरक्षित करना सबसे ज़्यादा रिटर्न देने वाला अकेला हस्तक्षेप है।
लेकिन एक चेतावनी भी है जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता — यह पूरा मॉडल कीमत का हिसाब लगाता है, उपलब्धता का नहीं। जब सरकार खाद कारखानों को पहले के मुकाबले 70% गैस दे रही है, तो वह कीमत की नहीं, भौतिक कमी की समस्या है। और कमी का इलाज किसी कीमत पर नहीं मिलता।
स्रोत: ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन, अटलांटिक काउंसिल, द प्रिंट, प्रधानमंत्री कार्यालय, डेक्कन हेराल्ड, वर्ल्ड बैंक



