मानसून सत्र में पेश विधेयक सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या 33 से बढ़ाकर 37 करता है — पर अदालत की असली दिक़्क़त सिर्फ़ गिनती की नहीं है।
विधेयक में है क्या
“सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026” 20 जुलाई 2026 को लोकसभा में पेश किया गया। क़ानून एवं न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल द्वारा पेश इस विधेयक का एक ही मुख्य प्रावधान है — भारत के मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर सुप्रीम कोर्ट के जजों की स्वीकृत संख्या 33 से बढ़ाकर 37 करना।
यानी मुख्य न्यायाधीश को जोड़कर अदालत की कुल स्वीकृत क्षमता 34 से बढ़कर 38 हो जाएगी। यह विधेयक सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) अधिनियम, 1956 में संशोधन करता है। PRS लेजिस्लेटिव रिसर्च के अनुसार, जजों के वेतन, सहायक स्टाफ़ और अन्य सुविधाओं पर होने वाला ख़र्च भारत की संचित निधि से वहन किया जाएगा।
अध्यादेश से विधेयक तक — यह रास्ता क्यों चुना गया
यह विधेयक शून्य से नहीं आया। यह 16 मई 2026 को जारी “सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) संशोधन अध्यादेश, 2026” की जगह लेने के लिए लाया गया है। यानी सरकार ने संसद सत्र के बाहर अध्यादेश के ज़रिए यह बदलाव पहले ही लागू कर दिया था, और अब संसद से उसकी मंज़ूरी ली जा रही है।
अध्यादेश का रास्ता चुनना अपने आप में एक संकेत है — इसका मतलब है कि सरकार ने इसे इतना ज़रूरी माना कि मानसून सत्र तक इंतज़ार करना उचित नहीं समझा। संविधान के तहत अध्यादेश को संसद के अगले सत्र की शुरुआत से छह हफ़्ते के भीतर मंज़ूरी मिलनी आवश्यक होती है, वरना वह प्रभावहीन हो जाता है।
58,669 मुक़दमे: संख्या के पीछे की कहानी
विधेयक के साथ पेश विधायी सामग्री के अनुसार, 1 जून तक सुप्रीम कोर्ट में 58,669 मामले लंबित थे। इन्हीं दस्तावेज़ों में कहा गया है कि मुक़दमों के दाख़िल होने की तुलनात्मक रूप से ऊँची दर के कारण लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है, और मुख्य न्यायाधीश ने सरकार को बताया है कि जजों की अपर्याप्त संख्या इस बैकलॉग का एक प्रमुख कारण है।
सरकार का तर्क सीधा है — जज बढ़ेंगे तो और बेंच बैठ सकेंगी, और अदालत ज़्यादा कुशलता से काम कर पाएगी, जिससे त्वरित न्याय सुनिश्चित होगा।
8 से 34 तक: एक लंबा सफ़र
सुप्रीम कोर्ट की क्षमता बढ़ाना कोई नई बात नहीं है। 1950 में अदालत की शुरुआत मुख्य न्यायाधीश समेत आठ जजों से हुई थी। इसके बाद संसद ने कई बार यह संख्या बढ़ाई — 1956, 1960, 1977, 1986, 2009 और सबसे हाल में 2019 में, जब जजों की संख्या 31 (मुख्य न्यायाधीश समेत) से बढ़ाकर 34 की गई। हर बार तर्क लगभग एक जैसा रहा है: बढ़ते मुक़दमों का बोझ।
क्या हर बार संख्या बढ़ाने से लंबितता घटी?
यहीं यह कहानी दिलचस्प हो जाती है। ऐतिहासिक रूप से जजों की संख्या बढ़ाने के बाद मामलों के निपटारे की रफ़्तार बढ़ी है, लेकिन लंबित मामलों की कुल संख्या में स्थायी गिरावट नहीं आई। इसकी बड़ी वजह यह है कि अदालत में नए मुक़दमे दाख़िल होने की दर भी उतनी ही तेज़ी से बढ़ती रही है। यानी क्षमता बढ़ी, लेकिन माँग उससे भी तेज़ बढ़ी।
क्यों सिर्फ़ जजों की गिनती काफ़ी नहीं
संविधान विशेषज्ञ और अदालती कामकाज पर नज़र रखने वाले शोधकर्ता लंबे समय से यह तर्क देते रहे हैं कि लंबितता की समस्या बहु-आयामी है। कुछ प्रमुख पहलू ये हैं:
पहला — स्वीकृत बनाम कार्यरत संख्या का अंतर। स्वीकृत संख्या बढ़ाना एक बात है, उस संख्या तक नियुक्तियाँ समय पर पूरी करना दूसरी। अगर कॉलेजियम और सरकार के बीच नियुक्ति प्रक्रिया धीमी रहती है, तो काग़ज़ पर बढ़ी क्षमता ज़मीन पर नहीं उतरती।
दूसरा — विशेष अनुमति याचिकाओं (SLP) का दबाव। सुप्रीम कोर्ट में आने वाले मामलों का बड़ा हिस्सा SLP का है। जब तक इस चरण पर छँटाई का कोई प्रभावी तंत्र नहीं बनता, नए जज भी उसी बाढ़ का सामना करेंगे।
तीसरा — बेंच का बँटवारा। सुप्रीम कोर्ट ज़्यादातर दो या तीन जजों की बेंच में बैठता है। चार अतिरिक्त जज लगभग एक-दो अतिरिक्त बेंच बना सकते हैं। यह मददगार है, पर संविधान पीठों (पाँच या उससे अधिक जज) की माँग बढ़ने पर वही जज दोबारा बड़ी बेंचों में लग जाते हैं, जिससे नियमित सुनवाई प्रभावित होती है।
चौथा — बुनियादी ढाँचा और सहायक तंत्र। ज़्यादा जजों का मतलब है ज़्यादा कोर्टरूम, ज़्यादा रजिस्ट्री स्टाफ़, ज़्यादा लॉ क्लर्क और ज़्यादा प्रशासनिक क्षमता। विधेयक में ख़र्च का प्रावधान है, लेकिन इसका क्रियान्वयन कितनी तेज़ी से होता है, यह अलग सवाल है।
मानसून सत्र के बड़े तस्वीर में यह विधेयक कहाँ है
SCC ऑनलाइन के अनुसार, 2026 का मानसून सत्र 20 जुलाई से 13 अगस्त तक चल रहा है और इसमें 19 बैठकें प्रस्तावित हैं। सत्र की शुरुआत में संसद के समक्ष 28 विधेयक लंबित थे। सुप्रीम कोर्ट से जुड़े इस विधेयक के अलावा आयकर (संशोधन) विधेयक, MSME विकास (संशोधन) विधेयक, जन्म-मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक और विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक भी एजेंडे में हैं।
यानी यह विधेयक न्यायिक क्षमता को लेकर सरकार की उस व्यापक क़ानूनी पहल का हिस्सा है, जिसमें आर्थिक शासन, शिक्षा नियमन और अनुपालन ढाँचे से जुड़े बदलाव भी शामिल हैं।
आगे क्या देखना होगा
तीन चीज़ों पर नज़र रखना उपयोगी होगा। पहला, विधेयक पारित होने के बाद चार नई नियुक्तियाँ कितनी जल्दी पूरी होती हैं — यही सबसे बड़ा व्यावहारिक संकेतक होगा। दूसरा, क्या अदालत अतिरिक्त क्षमता का इस्तेमाल पुराने लंबित मामलों को निपटाने में करती है या नए मामलों को संभालने में। और तीसरा, क्या इसके साथ मुक़दमों की छँटाई और सुनवाई प्रक्रिया में कोई संरचनात्मक सुधार भी आता है।
चार जज जोड़ना ज़रूरी क़दम हो सकता है, लेकिन 58 हज़ार से ज़्यादा लंबित मामलों के आँकड़े को देखते हुए यह अकेले पर्याप्त क़दम शायद न हो। असली फ़र्क़ तब दिखेगा जब क्षमता बढ़ाने के साथ प्रक्रिया भी बदले।
स्रोत: PRS लेजिस्लेटिव रिसर्च, SCC ऑनलाइन, पीआईबी, आकाशवाणी न्यूज़, डेक्कन हेराल्ड



