केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 31 जुलाई को खेलो इंडिया योजना और राष्ट्रीय खेल महासंघों की सहायता के लिए पाँच साल में 36,441 करोड़ रुपये मंज़ूर किए — यह पिछले कार्यक्रम से लगभग आठ गुना है। समझिए यह पैसा जाएगा कहाँ, और असली चुनौती क्या है।
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने शुक्रवार, 31 जुलाई को खेलो इंडिया योजना के संशोधित स्वरूप और राष्ट्रीय खेल महासंघों को बढ़ी हुई सहायता (ANSF) को मंज़ूरी दे दी। दोनों के लिए कुल 36,441 करोड़ रुपये का प्रावधान है, जो वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक की पाँच साल की अवधि के लिए है।
सरकार इसे आज़ादी के बाद का सबसे महत्वाकांक्षी खेल विकास कार्यक्रम बता रही है। सरकारी बयान के मुताबिक यह आवंटन पिछले खेलो इंडिया कार्यक्रम से लगभग आठ गुना बड़ा है।
पैसा कहाँ बँटा है
कुल राशि दो हिस्सों में बँटी है:
- खेलो इंडिया योजना — 29,054 करोड़ रुपये। यह हिस्सा ज़मीनी स्तर पर प्रतिभा का पूल तैयार करने पर केंद्रित है।
- राष्ट्रीय खेल महासंघों को सहायता (ANSF) — 7,387 करोड़ रुपये। यह हिस्सा उन खिलाड़ियों और टीमों पर खर्च होगा जो पहले ही ऊपरी स्तर पर पहुँच चुके हैं।
बढ़ोतरी का पैमाना समझने के लिए एक आंकड़ा काफी है: ANSF के लिए वर्ष 2026-27 का मौजूदा बजटीय आवंटन 425 करोड़ रुपये था। अब पाँच साल के लिए 7,387 करोड़ रुपये तय हुए हैं।
ANSF की राशि से कोचिंग, स्पोर्ट्स साइंस, आधुनिक उपकरण, अंतरराष्ट्रीय एक्सपोज़र, प्रशिक्षण शिविर, विदेशी विशेषज्ञों की नियुक्ति और बड़ी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भागीदारी का खर्च उठाया जाएगा। सरकार के अनुसार इसमें ग्लोबल साउथ के देशों के साथ खेल सहयोग और भारत के पारंपरिक खेलों के अंतरराष्ट्रीय प्रचार का प्रावधान भी है।
स्कूल से शुरुआत: दो नई पहल
योजना में स्कूल स्तर के लिए दो नए घटक जोड़े गए हैं — खेलो इंडिया फीडर स्कूल (KIFS) और खेलो इंडिया उत्कृष्ट विद्यालय (KIUV)। सरकारी बयान के मुताबिक इनका मक़सद खेल को मुख्यधारा की पढ़ाई के साथ जोड़ना और प्रतिभाशाली बच्चों की जल्दी पहचान कर उन्हें व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाना है।
योजना में महिला खिलाड़ियों, पैरा-एथलीटों और स्वदेशी खेलों के लिए अवसर बढ़ाने पर विशेष ज़ोर दिया गया है। इसके अलावा राष्ट्रीय खेलों के आयोजन और भारत में बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजनों की मेज़बानी के लिए भी सहायता का प्रावधान है।
एक डिजिटल मंच, सब कुछ एक जगह
योजना का एक कम चर्चित लेकिन अहम हिस्सा एकीकृत डिजिटल खेल मंच है। इस पर खिलाड़ियों का डेटाबेस, बुनियादी ढाँचा, प्रतियोगिताएँ, कोचिंग संसाधन, प्रतिभा आकलन, फंडिंग और फिट इंडिया की भागीदारी — सब एक साथ जुड़ेंगे। सरकार का दावा है कि इससे डेटा-आधारित योजना, पारदर्शी शासन और हर खिलाड़ी के लिए व्यक्तिगत विकास योजना संभव होगी।
समय क्यों अहम है
यह फैसला ऐसे वक्त आया है जब ग्लासगो में राष्ट्रमंडल खेल 2026 का समापन हो रहा है और भारत ने औपचारिक रूप से 2030 खेलों की मेज़बानी संभाली है, जो अहमदाबाद में होंगे। सरकार 2036 ओलंपिक की मेज़बानी के लिए भी दावेदारी कर रही है।
यानी अगले पाँच साल का यह बजट ठीक उसी अवधि को कवर करता है जिसमें भारत को घरेलू ज़मीन पर एक बड़े बहु-खेल आयोजन का मेज़बान बनना है। मेज़बान देश से बेहतर प्रदर्शन की अपेक्षा स्वाभाविक होती है, और यह आवंटन उसी अपेक्षा की तैयारी है।
सावधानी: पैसा ज़रूरी शर्त है, पर्याप्त नहीं
बड़े आवंटन को उपलब्धि मान लेना जल्दबाज़ी होगी। तीन सवाल अब भी खुले हैं:
पहला — खर्च की क्षमता। भारत में खेल बजट का पूरा इस्तेमाल न हो पाना एक पुरानी समस्या रही है। आठ गुना बड़ा बजट तभी असर दिखाएगा जब उसे खर्च करने का प्रशासनिक ढाँचा भी उसी अनुपात में बढ़े।
दूसरा — महासंघों का शासन। ANSF का बड़ा हिस्सा राष्ट्रीय खेल महासंघों के ज़रिए जाएगा। इनमें से कई महासंघ बीते वर्षों में प्रशासनिक विवादों, चुनावों में देरी और अदालती मामलों में उलझे रहे हैं। पैसे की मात्रा बढ़ाने से जवाबदेही अपने आप नहीं बढ़ती। इस लिहाज़ से डिजिटल मंच का पारदर्शी शासन वाला वादा सबसे ज़्यादा परखने लायक है।
तीसरा — मापने का पैमाना। पदक एक नतीजा हैं, प्रक्रिया नहीं। किसी योजना का असल मूल्यांकन इस बात से होना चाहिए कि कितने ज़िलों में नियमित प्रशिक्षण उपलब्ध हुआ, कितने खिलाड़ी जूनियर से सीनियर स्तर तक टिके, और चोट-प्रबंधन तथा स्पोर्ट्स साइंस का ढाँचा कितना गहरा हुआ।
ग्लासगो में भारतीय मुक्केबाजों के सात स्वर्ण इस बात की मिसाल हैं कि जब किसी एक खेल में लगातार, केंद्रित निवेश होता है तो नतीजे आते हैं। असली परीक्षा यह होगी कि 36,441 करोड़ रुपये उसी तरह की गहराई कितने और खेलों में पैदा कर पाते हैं।
स्रोत: प्रधानमंत्री कार्यालय, तेलंगाना टुडे (पीटीआई), लेटेस्टली (पीटीआई), ओपन द मैगज़ीन



