मंगलवार को अमेरिका-ईरान संघर्ष पाँच महीने पूरे कर रहा है। हमलों में ठहराव आया है, लेकिन बातचीत का पेच उसी जलडमरूमध्य पर अटका है जिससे सामान्य दिनों में दुनिया का 20 प्रतिशत तेल गुज़रता है।
अमेरिकी सेना ने ईरान पर लगातार 13 रातों की बमबारी के बाद हमले रोक दिए हैं। एसोसिएटेड प्रेस के अनुसार, इस ठहराव के साथ ही कूटनीतिक कोशिशें तेज़ हुई हैं ताकि संघर्ष दोबारा पूर्ण युद्ध में न बदल जाए। ईरान ने भी अमेरिकी सैन्य ठिकानों वाले पड़ोसी देशों पर जवाबी हमले थाम दिए हैं।
मंगलवार को यह संघर्ष पाँच महीने पूरे करेगा। लेकिन क्या यह वाक़ई मोड़ है, यह अभी साफ़ नहीं है।
ठहराव है, समझौता नहीं
वाशिंगटन इंस्टीट्यूट फ़ॉर नियर ईस्ट पॉलिसी के प्रबंध निदेशक माइकल सिंह इस ठहराव को लेकर सतर्क हैं। एपी से बातचीत में उन्होंने कहा कि अगर यह कई दिनों तक चलने वाला ठहराव बनता है तो यह महत्वपूर्ण होगा, लेकिन अभी कहना मुश्किल है कि यह महज़ एक ऑपरेशनल विराम है या पर्दे के पीछे चल रही कूटनीति के लिए दिया गया समय।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक साथ दोनों रास्ते खुले रखे हैं। शुक्रवार को व्हाइट हाउस में पत्रकारों से उन्होंने कहा कि अमेरिका के पास दो विकल्प हैं — या तो वही करते रहें जो अब तक कर रहे हैं, या बातचीत करें, जो वे अभी भी कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें नहीं लगता कि ईरान अभी समझौते के लिए “तैयार” है, हालाँकि उनके मुताबिक़ दिन बीतने के साथ ईरान ज़्यादा गंभीर होता जा रहा है।
असली विवाद: होर्मुज़ जलडमरूमध्य
इस पूरे संघर्ष का केंद्र एक सँकरा समुद्री रास्ता है — होर्मुज़ जलडमरूमध्य, जिससे सामान्य दिनों में दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत तेल गुज़रता है।
युद्ध शुरू होते ही ईरान ने टैंकरों और मालवाहक जहाज़ों पर फ़ायरिंग कर इस रास्ते को दबाव में ले लिया था। जून में अंतरिम संघर्षविराम पर हस्ताक्षर के बाद जलडमरूमध्य के नियंत्रण को लेकर खींचतान शुरू हुई — ईरान चाहता था कि जहाज़ उसके तट के पास वाले रास्ते से गुज़रें और उसने शुल्क वसूलने की बात भी कही। जहाज़ अमेरिकी निगरानी में ओमान के तट वाले दक्षिणी रास्ते का इस्तेमाल बढ़ाने लगे, जिसके बाद ईरान ने कुछ जहाज़ों पर हमला किया।
इसके जवाब में अमेरिका ने ईरान के तटीय ठिकानों पर हमले किए और बाद में लक्ष्यों का दायरा बढ़ाते हुए दक्षिण में पुलों और बुनियादी ढाँचे तथा ईरान के भीतरी हिस्सों को भी निशाना बनाया।
ओमान की मध्यस्थता
मध्यस्थता में शामिल एक क्षेत्रीय अधिकारी ने एपी को बताया कि गंभीर कूटनीति चल रही है और हमलों में ठहराव “एक सकारात्मक संकेत” है। उनके अनुसार अमेरिका और ईरान दोनों अंतरिम संघर्षविराम पर लौटना चाहते हैं, और जिस समझौते पर बात हो रही है उसका केंद्र यह है कि ईरान होर्मुज़ से जहाज़ों की आवाजाही संभाले, लेकिन कम प्रतिबंधों के साथ।
ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने रविवार को पुष्टि की कि सप्ताहांत में ईरान और ओमान के बीच जलडमरूमध्य को लेकर कई दौर की तकनीकी बातचीत हुई। उनके मुताबिक़ ओमानी प्रतिनिधिमंडल शनिवार दोपहर तेहरान से रवाना हो गया, लेकिन बातचीत में प्रगति हुई है और सिलसिला जारी है।
क्षेत्र में तनाव बरक़रार
हमलों में ठहराव के बावजूद क्षेत्रीय हालात तनावपूर्ण हैं। यमन के हूती विद्रोहियों ने शनिवार को कहा कि उन्होंने लाल सागर के रणनीतिक शहर होदैदा पर सऊदी हवाई हमलों के जवाब में सऊदी अरब पर मिसाइलें और ड्रोन दागे। ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों का दावा है कि उन्होंने बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य बंद कर दिया है, जो होर्मुज़ में व्यवधान के बाद सऊदी तेल निर्यात के लिए और अहम हो गया था।
अमेरिकी सेना ईरानी बंदरगाहों पर नौसैनिक नाकेबंदी भी लागू कर रही है। सेना के अनुसार शुक्रवार को ओमान की खाड़ी में मोज़ाम्बिक का ध्वज लगे एक जहाज़ को नाकाम किया गया, जिसने चेतावनियों की अनदेखी कर नाकेबंदी तोड़ने की कोशिश की।
आने वाले हफ़्ते इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की वाशिंगटन में ट्रंप से प्रस्तावित मुलाक़ात भी अनिश्चितता बढ़ा रही है। एपी के अनुसार इज़रायल, जिसने 28 फ़रवरी को अमेरिका के साथ यह युद्ध शुरू किया था, हाल के अमेरिकी हमलों से उल्लेखनीय रूप से दूर रहा है।
भारत के लिए मायने
भारत के लिए यह ख़बर सिर्फ़ विदेश डेस्क की नहीं है। भारत अपनी कच्चे तेल की ज़रूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है और उसका बड़ा हिस्सा खाड़ी से इसी रास्ते आता है। होर्मुज़ में हर व्यवधान भारत पर एक साथ तीन तरह से असर डालता है — कच्चे तेल की क़ीमत, ढुलाई का भाड़ा और युद्ध जोखिम बीमा का प्रीमियम।
राहत की बात यह है कि भारत ने भंडार पहले से बाँध रखे हैं। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने 2 जुलाई को बताया था कि देश के पास 60 दिन का कच्चा तेल, 60 दिन का एलएनजी और 45 दिन का एलपीजी भंडार है। लेकिन यह बचाव अस्थायी है — और यही वजह है कि दिल्ली के लिए भी ओमान में चल रही बातचीत मायने रखती है।
स्रोत: एनपीआर, सीएनएन, वाशिंगटन पोस्ट, बिज़नेस स्टैंडर्ड



