‘3 इडियट्स’ के फुंसुख वांगड़ू की असली प्रेरणा रहे इंजीनियर-कार्यकर्ता अब दिल्ली में अस्पताल में भर्ती हैं — NSA हिरासत से लेकर NEET भूख हड़ताल तक का सफर समझिए
दिल्ली हाई कोर्ट ने हाल ही में सोनम वांगचुक को सफदरजंग अस्पताल से मेदांता अस्पताल शिफ्ट करने की अनुमति दी, यह कहते हुए कि उनकी भूख हड़ताल को देखते हुए निरंतर चिकित्सा निगरानी जरूरी है।
यह घटनाक्रम अचानक नहीं आया — बल्कि यह लद्दाख के इस मशहूर शिक्षाविद् और जलवायु कार्यकर्ता के पिछले एक साल के लंबे टकराव की एक और कड़ी है। आखिर सोनम वांगचुक बार-बार भूख हड़ताल की राह क्यों चुनते हैं, और मौजूदा विवाद की जड़ें कहां हैं?
कौन हैं सोनम वांगचुक
इंजीनियर, शिक्षा-सुधारक और जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक लद्दाख में वैकल्पिक शिक्षा मॉडल और आइस स्तूपा जैसी जल-संरक्षण तकनीकों के लिए जाने जाते हैं।
आमिर खान की फिल्म “3 इडियट्स” के किरदार फुंसुख वांगड़ू को उनके जीवन से प्रेरित माना जाता है। बीते एक दशक में वे लद्दाख को छठी अनुसूची का दर्जा और पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने की मांग को लेकर कई बार अनशन पर बैठ चुके हैं।
सितंबर 2025: NSA हिरासत
पिछले साल सितंबर 2025 में लद्दाख में राज्य के दर्जे की मांग को लेकर हुई हिंसा में चार लोगों की जान गई थी और कई घायल हुए थे। इसके बाद 26 सितंबर 2025 को वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत हिरासत में लिया गया।
उनकी पत्नी डॉ. गीतांजलि अंगमो ने सुप्रीम कोर्ट में हेबियस कॉर्पस याचिका दाखिल की। मामला जब सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के करीब पहुंचा, तो मार्च 2026 में केंद्र सरकार ने अचानक उनकी हिरासत वापस ले ली — जिससे कानूनी समीक्षा टल गई और यह सवाल भी उठा कि क्या हिरासत जांच से बचने के लिए हटाई गई थी।
जून 2026: नया मोर्चा — NEET और शिक्षा व्यवस्था
रिहाई के कुछ महीनों बाद ही, 28 जून 2026 को वांगचुक ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की। इस बार मुद्दा लद्दाख नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा व्यवस्था था।
वे कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के अनशन में शामिल हुए, जिसकी मांग थी — NEET-UG 2026 सहित बार-बार सामने आ रही परीक्षा गड़बड़ियों की जांच, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा, और परीक्षा अनियमितताओं से जुड़ी कथित छात्र आत्महत्याओं के पीड़ित परिवारों के लिए मुआवजा।
क्यों बार-बार भूख हड़ताल
वांगचुक का तर्क रहा है कि लद्दाख जैसे सीमांत, कम आबादी वाले क्षेत्र और आम छात्रों की आवाज़ दिल्ली में आसानी से अनसुनी रह जाती है, इसलिए अहिंसक सत्याग्रह ही उनके पास सबसे कारगर औजार है।
आलोचक इसे राजनीतिक दबाव की रणनीति बताते हैं, जबकि समर्थक इसे महात्मा गांधी की परंपरा से जोड़कर देखते हैं। उनकी सक्रियता को लेकर विवाद भी कम नहीं रहे — FCRA (विदेशी चंदा नियमन कानून) के तहत जांच और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े दावे इसका हिस्सा रहे हैं, जिन्हें वे और उनके समर्थक राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताते रहे हैं।
अभी स्थिति क्या है
26 दिन के अनशन के बाद वांगचुक को पुलिस द्वारा जबरन अस्पताल ले जाया गया था।
हाल ही में प्रधानमंत्री के एक बयान के बाद, जिसमें परीक्षा प्रबंधन के मुद्दे पर संसदीय प्रक्रिया के जरिए “सख्त कार्रवाई” का आश्वासन दिया गया, उन्होंने अपना अनशन समाप्त किया। लेकिन डॉक्टरों की सलाह पर अब उन्हें बेहतर निगरानी वाले मेदांता अस्पताल भेजा जा रहा है, जबकि CJP का कहना है कि जब तक शिक्षा मंत्री इस्तीफा नहीं देते, जंतर-मंतर पर धरना जारी रहेगा।
बड़ा सवाल
यह पूरा प्रकरण एक बड़े सवाल की ओर इशारा करता है — भारत की प्रवेश परीक्षा व्यवस्था में भरोसा बहाल करने के लिए ढांचागत सुधार कब होंगे, और क्या एक व्यक्ति की भूख हड़ताल जैसी चरम रणनीति के बगैर भी जवाबदेही मुमकिन है।
स्रोत: ऑर्गनाइज़र, ड्रिश्टि ज्यूडिशियरी, लाइवलॉ, बार एंड बेंच, ब्रूट मीडिया



