राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026 दोनों सदनों से पारित — तीन साल तक की सज़ा का प्रावधान, DMK का तीखा विरोध और 1971 के कानून में 55 साल पुरानी खामी की कहानी।
संसद ने राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित कर दिया है। इस कानून के लागू होने के बाद राष्ट्रगीत “वंदे मातरम्” को वही कानूनी संरक्षण मिल जाएगा जो अब तक सिर्फ राष्ट्रगान “जन गण मन” को हासिल था। विधेयक अब राष्ट्रपति की मंज़ूरी का इंतज़ार कर रहा है।
संसद में क्या-क्या हुआ
विधेयक 24 जुलाई 2026 को राज्यसभा में पेश किया गया था। ऊपरी सदन ने इसे 29 जुलाई को पारित किया, जबकि लोकसभा ने 30 जुलाई को विपक्ष के हंगामे के बीच संक्षिप्त चर्चा के बाद ध्वनिमत से इसे मंज़ूरी दे दी।
असल में बदल क्या रहा है
यह विधेयक 1971 के राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम में संशोधन करता है। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के अनुसार, नया प्रावधान वहां लागू होगा जहां कोई व्यक्ति जानबूझकर राष्ट्रगान या राष्ट्रगीत के गायन को रोके, या गायन में लगे किसी समूह में बाधा डाले।
सज़ा का प्रावधान इस तरह है:
- पहली बार दोषी पाए जाने पर तीन साल तक की कैद, जुर्माना, या दोनों।
- दूसरी और उसके बाद हर बार दोषसिद्धि पर कम से कम एक साल की कैद अनिवार्य।
55 साल पुरानी खामी
सरकार का तर्क यह है कि 1971 के अधिनियम में एक ढांचागत खामी थी। यह कानून राष्ट्रीय ध्वज, संविधान और राष्ट्रगान के अपमान को दंडनीय बनाता था, लेकिन राष्ट्रगीत का इसमें कोई विशिष्ट उल्लेख नहीं था। यानी वंदे मातरम् को संविधान सभा से मान्यता तो मिली थी, पर उसके अपमान पर कोई दंडात्मक प्रावधान मौजूद नहीं था। यह विधेयक उसी अंतर को भरने का दावा करता है।
विपक्ष की आपत्ति
लोकसभा में सबसे तीखा विरोध DMK की ओर से आया। सांसद कनिमोझी ने कहा कि देश के संविधान निर्माताओं ने सोच-समझकर राष्ट्रगीत के केवल दो छंदों को अपनाया था, और सरकार अब इस विधेयक के ज़रिए विभाजनकारी एजेंडा आगे बढ़ा रही है। DMK का आरोप रहा कि विधेयक लोगों पर उनकी इच्छा के विरुद्ध थोपा जा रहा है और इसका मक़सद माहौल का ध्रुवीकरण है।
सत्ता पक्ष की ओर से भाजपा सांसद संबित पात्रा ने जवाब दिया कि संसद पहले ही राष्ट्रगीत पर लंबी बहस कर चुकी है और यह विधेयक उसे महज़ कानूनी संरक्षण दे रहा है।
पृष्ठभूमि: दिसंबर 2025 की बहस
यह विधेयक अचानक नहीं आया। दिसंबर 2025 में वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ पर लोकसभा और राज्यसभा — दोनों में विशेष चर्चा हुई थी। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के लिखे इस गीत को स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में जो केंद्रीय भूमिका मिली, और आज़ादी के बाद संविधान सभा ने इसे राष्ट्रगान के समान दर्जा देते हुए राष्ट्रगीत के रूप में जो स्थान दिया — वह बहस उसी विरासत पर केंद्रित थी। मौजूदा विधेयक को उसी चर्चा का विधायी विस्तार माना जा रहा है।
आगे क्या
राष्ट्रपति की मंज़ूरी के बाद यह कानून बन जाएगा। व्यवहार में सबसे बड़ा सवाल क्रियान्वयन का होगा — “जानबूझकर बाधा डालना” की व्याख्या कैसे होगी, और स्कूलों, सार्वजनिक कार्यक्रमों या सिनेमाघरों जैसे स्थलों पर यह प्रावधान किस हद तक लागू होगा। इसी तरह के सवाल राष्ट्रगान से जुड़े मामलों में पहले भी अदालतों तक पहुंच चुके हैं, और यह मानना उचित होगा कि नए प्रावधान की व्याख्या भी आगे चलकर न्यायिक परीक्षण से गुज़रेगी।
स्रोत: पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च, डेक्कन हेराल्ड, एएनआई, द ट्रिब्यून



